मोबाइल,हेडफोन-गेमिंग से बच्चों के बहरे होने का खतरा बढ़ा बचाव के लिए बच्चों को जोड़ें योग प्राणायाम से:- योगाचार्य महेश पाल
मोबाइल,हेडफोन-गेमिंग से बच्चों के बहरे होने का खतरा बढ़ा बचाव के लिए बच्चों को जोड़ें योग प्राणायाम से:- योगाचार्य महेश पाल
टेक्नोलॉजी विकास एवं उससे जुड़े नये-नये उपकरण आधुनिक जीवनशैली को भले ही बहुत असान कर दिया हो लेकिन इसके अनियंत्रित उपयोग से बच्चों व युवाओं को भारी परेशानियों का सामना भी करना पड़ रहा है, योगाचार्य महेश पाल बताते हैं कि बच्चे छोटी उम्र में ही फोन,हेडफोन और गेमिंग की लत का शिकार हो रहे हैं, जिससे बच्चों व युबाओ के अंदर चिड़चिड़ापन, गुस्सा, तनाव, कमजोर याददाश्त, सिरदर्द अधिक देर तक हेडफोन या ईयरफोन लगाने से सुनने की क्षमता कम होना, बहरापन, कान मैं दर्द, संक्रमण, ध्यान केंद्रित करने में समस्या, मेमोरी लॉस जैसे कई नुकसान बच्चों व युवाओं हो रहे हैं लगातार कानों पर मोबाइल व ईयरफोन लगाने का बच्चों की श्रवण शक्ति पर नकारात्मक असर पड़ रहा है और वे बधिरता से ग्रस्त होते जा रहे हैं।पिछले कई समय में बच्चों के कानों में दर्द, सुनने में परेशानी, बधिरता और संक्रमण की शिकायतें बहुत ज्यादा आ रही हैं। वहीं इन उपकरणों के उपयोग से कानों पर काफी ज्यादा जोर पड़ता है और घंटो तक तेज आवाज सुनने से सुनने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2050 तक 1.6 अरब लोग बधिरता से प्रभावित हो सकते हैं। जिनमें अधिकांश लोग मध्यम व कम आय वर्ग के होंगे। यूं तो साठ साल के बाद सुनने की क्षमता प्राकृतिक रूप से कम हो जाती है, लेकिन हाल के वर्षों में लगातार कानों में ईयरफोन आदि लगाने से यह संकट बच्चों एवं युवाओं में बढ़ता जा रहा है। खासकर वे बच्चे एवं युवा जो लगातार लेपटॉप व मोबाइल पर गेमिंग व अन्य कार्यक्रम तेज आवाज में घंटों सुनते रहते हैं। पहले कम सुनने की समस्या दिखायी देती है और कालांतर में यह समस्या बहरेपन में तब्दील हो जाती है। दरअसल, कानों पर तकनीकी शोर का इतना अधिक दबाव बढ़ गया है कि बच्चे एवं युवा अपनी सुनने की प्राकृतिक क्षमता खोने लगे हैं। जो एक विश्वव्यापी आसन्न गंभीर संकट को ही दशार्ता है,हमारे कानों के लिए 40 से 60 डेसिबल सुनने की क्षमता निर्धारित की है जो सही है, लेकिन इससे ऊपर बानी 85 से 100 डेसिबल साउंड कानों के लिए खतरनाक है। आंकड़ों की बात करें तो पिछले दशकों में दुनिया में 3.4 करोड़ से अधिक बच्चों में कम सुनाई देने की क्षमता के केस सामने आए हैं। यह दुनिया की एक भयावह एवं चुनौतीपूर्ण समस्या की ओर बढ़ने का संकेत है, एक पूरी पीढ़ी के बहरे होने की चुनौती को खड़ा कर रहा है। विडंबना यह है कि जीवनशैली में नित-नये आ रहे बदलावों तथा शिक्षा कार्यों के लिये ऑनलाइन रहने की दलील ने बच्चों को मोबाइल लेपटॉप ईयरफोन का आदी बना दिया है। तेज आवाज का संगीत व तरह-तरह के कंसर्ट बच्चों को लुभाते हैं। ऐसे में अभिभावक बच्चों को इस संकट की भयावहता से अवगत कराएं तथा बच्चों व युवाओं को योग प्राणायाम से अवश्य छोड़ें योग प्राणायाम के अभ्यास से बच्चों के अंदर विचार शैली का परिवर्तन होता है उनका मानसिक स्वास्थ्य सही रहता है और वह एक सही निर्णय लेने में सक्षम बनते हैं जब बच्चे मेडिटेशन करते हैं और भ्रामरी प्राणायाम व योग का अभ्यास करते हैं तो बच्चों के अंदर कानों से संबंधित इन्फेक्शन दूर होते हैं और वह स्वस्थ बने रहते हैं, श्रवण यानी सुनने की क्षमता जीवन को नया आकार देने,मानसिक दरिद्रता का निवारण करने तथा ऊंचे ध्येय की पूर्ति हेतु आगे बढ़ने की सही चाबी है। जैसे दवा रोग नाशक होती है, पर गलत दवा के सेवन से रोग घटने की अपेक्षा अधिक बढ़ जाता है, वैसे ही गलत जीवनशैली, गलत तरीको से जीने, गलत तरीके से सुनने की क्षमता का उपयोग करने, अनियंत्रित शोर-शराबे को सुनने से जीवन में विकृतियां एवं परेशानियां घुस जाती है और अनेक तरह के श्रवण रोगों का हमला होने लगता है। इसलिये सुनने की क्षमता का सम्यक उपयोग जरूरी है। देखना और सुनना ये दोनों ही जीवन-विकास एवं ज्ञान वृद्धि के माध्यम है। पर सुनना अधिक शक्तिशाली साधन है, क्योकि आंखों में जो दृश्य प्रतिबिम्बित होते हैं, वे तात्कालिक होते हैं। श्रवण-पथ से ही हम ज्ञान के साथ-साथ दीर्घकालिक अनुभवों को आत्मसात कर सकते हैं। इसलिये श्रवण-पथ या सुनने की क्षमता पर हो रहे हमलों को हम गंभीरता से ले अन्यथा सुनने की पंगुता हमारे जीवन का अभिशाप बन सकती है। इसलिए इन समस्याओं को देखते हुए बच्चों व युवाओं को योग से जोड़ना अति आवश्यक है जिससे कि वह शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ बने रहे और वह विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से जो नुकसान शरीर को हो रहा है उनसे बचाव करने में सक्षम बना सके
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